कुंडली के ग्यारहवें भाव को कर्म भाव कहा जाता है एवं इस में स्थित राशि के स्वामी को एकादशेश (लाभेश) कहा जाता है| ज्योतिष में ग्यारहवाँ भाव आय, लाभ, बड़े भाई व मित्र का होता है | कुंडली के अलग-अलग भावों में बैठकर एकादशेश (लाभेश) अलग-अलग फल प्रदान करता है |
पहले तो जल्दी से यह जान लें कि किसी भी भाव के स्वामी को कैसे पहचानते हैं ? अगर ग्यारहवें भाव में 1 लिखा हो तो इसका मतलब ग्यारहवें भाव में मेष राशि है | मेष राशि के स्वामी मंगल हैं | इसलिए एकादशेश (लाभेश) मंगल हुए | निम्नलिखित तालिका से आप किसी भी भाव के स्वामी को पहचान सकते हैं :
| राशि क्रम | राशि | राशि स्वामी |
| 1 | मेष | मंगल |
| 2 | वृषभ | शुक्र |
| 3 | मिथुन | बुध |
| 4 | कर्क | चंद्र |
| 5 | सिंह | सूर्य |
| 6 | कन्या | बुध |
| 7 | तुला | शुक्र |
| 8 | वृश्चिक | मंगल |
| 9 | धनु | गुरु |
| 10 | मकर | शनि |
| 11 | कुंभ | शनि |
| 12 | मीन | गुरु |
एकादशेश (लाभेश) लग्न में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):

एकादशेश (लाभेश) दूसरे भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):

एकादशेश (लाभेश) तीसरे भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):


एकादशेश (लाभेश) चौथे भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):

एकादशेश (लाभेश) पाँचवे भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):


एकादशेश (लाभेश) छठे भाव में
पराशर:

मानसागरी:


यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):

एकादशेश (लाभेश) सातवें भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):

एकादशेश (लाभेश) आठवें भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):



एकादशेश (लाभेश) नौवें भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):

एकादशेश (लाभेश) दशवे भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):


एकादशेश (लाभेश) ग्यारहवें भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):

एकादशेश (लाभेश) बारहवें भाव में
पराशर:

मानसागरी:

यवन जातक:

ज्योतिस्तत्त्वम् (अध्याय 33):



